Thursday, March 21, 2019

होली के हुड़दंग में महिलाओं से की बदसलूकी तो जाना पड़ेगा जेल

होली का त्योहार रंग और उल्लास से भरा होता है. इस त्योहार पर लोग जमकर होली खेलते हैं. एक दूसरे को रंगों से सराबोर कर देते हैं. लेकिन इस त्योहार के जोश में आप जाने अनजाने कानूनी पचड़े में भी पड़ सकते हैं. क्योंकि होली पर अक्सर महिलाएं भी खूब रंग खेलती हैं. ऐसे में यदि कोई पुरुष उनके साथ जोर जबरदस्ती करे. या उनको आपत्तिजनक तरीके से छूने की कोशिश करे तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है.

दरअसल, भारतीय दंड सहिंता यानी IPC महिलाओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है. इसलिए त्योहार पर भी उनके साथ कोई जोर जबरदस्ती करना किसी को भी महंगा पड़ सकता है. महिलाओें के साथ-साथ बच्चों के साथ भी जोर जबरदस्ती या छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले में भी सख्त कार्रवाई हो सकती है. पुलिस महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ धारा 354 के तहत मुकदमा दर्ज करती है. आइए पहले जानते हैं आईपीसी की धारा 354 के बारे में.

क्या है IPC की धारा 354

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जाता है. जहां स्त्री की मर्यादा और मान सम्मान को क्षति पहुंचाने के लिए उनके साथ जोर जबरदस्ती की जाए. उनको गलत नीयत से छुआ जाए. या उन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की जाए या फिर बुरी नीयत से हमला किया जाए. गलत मंशा के साथ महिलाओं से किया गया बर्ताव भी इसी धारा के दायरे में आता है.

क्या होती है सजा

भारतीय दंड संहिता के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की मर्यादा को भंग करने के लिए उस पर हमला या जोर जबरदस्ती करता है, तो उस पर आईपीसी की धारा 354 लगाई जाती है. जिसके तहत आरोपी पर दोष सिद्ध हो जाने पर दो साल तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है.

क्या होता है पॉक्सो एक्ट?

बच्चों के साथ जोर जबरदस्ती या छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती है. ये शब्द अंग्रेजी से आता है. इसका पूर्णकालिक मतलब होता है प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 यानी लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012. इस एक्ट के तहत नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराध और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है.

यह एक्ट बच्चों को सेक्सुअल हैरेसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है. पॉक्सो एक्ट की धारा 5 एफ, 6, 7, 8 और 17, किसी शैक्षिक संस्थान में बाल यौन उत्पीड़न से सबंधित है. अगर किसी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई होती है, तो आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जाता है. इस एक्ट के तहत धरे गए आरोपी को जमानत भी नहीं मिलती है. इस एक्ट में पीड़ित बच्ची या बच्चे के प्रोटेक्शन का भी प्रावधान हैं.

क्या है भारतीय दंड संहिता

भारतीय दण्ड संहिता यानी Indian Penal Code, IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा औ दण्ड का प्राविधान करती है. लेकिन यह जम्मू एवं कश्मीर और भारत की सेना पर लागू नहीं होती है. जम्मू एवं कश्मीर में इसके स्थान पर रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती है.

अंग्रेजों की देन है IPC

भारतीय दण्ड संहिता यानी आईपीसी सन् 1862 में ब्रिटिश काल के दौरान लागू हुई थी. इसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे. विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इसमें बड़ा बदलाव किया गया. पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही अपनाया. लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के अधीन आने वाले बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू कर दिया गया था.

Thursday, March 7, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: क्या मोदी के 'राष्ट्रवाद' से पीछे छूट जाएंगे रोज़ी रोटी के सवाल- नज़रिया

भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले और भारत की ओर से पाकिस्तान के बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक के बाद देश के सियासी हालात पूरी तरह बदल गए हैं.

आतंकवाद अब आगामी लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया है और 'बालाकोट एयर स्ट्राइक' के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़ायदे की स्थिति में दिखने लगे हैं.

आतंकवाद का मुद्दा रोज़गार, नौकरियां, रफ़ाल और कृषि संकट जैसे तमाम मुद्दों को निगल गया है.

यही वजह है कि पीएम मोदी लाभ की स्थिति में हैं क्योंकि वो ख़ुद को एक मज़बूत नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जो पाकिस्तान का मुक़ाबला कर सकता है और यही वो मसला है जहां विपक्ष लड़खड़ाता नज़र आता है.

हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी अभियान में इसका पूरा इस्तेमाल करते दिखें. अब इससे उन्हें वोट मिलेंगे या नहीं, यह एक अलग सवाल है.

सत्ताधारी पार्टी को युद्ध जैसै हालात में आमतौर पर फ़ायदा ही होता है क्योंकि देश में लोगों की भावनाएं उफ़ान मार रही होती हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1971 के बांग्लादेश युद्ध से फ़ायदा पहुंचा था. उन्होंने अप्रैल 1971 से लेकर दिसंबर 1971 तक युद्ध की तैयारी की और अंतत: ये युद्ध जीता भी.

इंदिरा ने अपनी तैयारियों को इतना गुप्त रखा कि जुलाई में भारत दौरे पर आए अमरीकी विदेश मंत्री किसिंजर को इसकी भनक तक नहीं लगी. इस वजह से तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन इंदिरा गांधी से इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उन्हें 'अ विच ऐंड अ बिच' तक कह डाला था.

एनडीए की अगुवाई में प्रधानमंत्री बनने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को भी करगिल युद्ध के दौरान पूरे देश का समर्थन मिला.

हालांकि इसके बाद बीजेपी चुनाव तो जीती लेकिन उसकी सीटों में इजाफ़ा नहीं हुआ. हालात तब सुधरे जब तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने परमाणु शक्ति से सम्पन्न दोनों पड़ोसी देशों के बीच युद्ध रुकवाने के लिए दख़ल दिया.

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बालाकोट एयर स्ट्राइक को अपनी जीत के दावे के तौर पर पेश कर रहे हैं. हालांकि सच्चाई ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तब कम हुआ जब अमरीका और बाक़ी पश्चिमी देशों ने इसमें हस्तक्षेप किया.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार अपने ट्वीट्स और बयानों के ज़रिए इसमें शामिल थे.

सत्ताधारी बीजेपी को लगता है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद मोदी की वापसी के मौक़े पहले के मुक़ाबले बेहतर हो गए हैं.

दिलचस्प ये है कि पुलवामा हमले से पहले बीजेपी तीन बड़े हिंदीभाषी राज्यों (राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में हुए विधानसभा चुनावों में विपक्षी कांग्रेस के सामने लगभग मुंह की खा चुकी थी.

विपक्षी पार्टियां रफ़ाल, नौकरियां और कृषि संकट जैसे मुद्दों को आक्रामकता से उछाल रही थीं और मोदी को रक्षात्मक रुख़ अख़्तियार करना पड़ रहा था.

बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर का डर भी सता रहा था. लेकिन पुलवामा और बालाकोट के बाद अब स्थिति नाटकीय रूप से बदल चुकी है और मोदी एक बार फिर आतंकवाद का मुद्दा लेकर मंच पर आगे आ गए हैं.

पुलवामा हमले ने बीजेपी को अपनी चुनावी रणनीति पर दोबारा विचार करने पर मजबूर किया है.

इससे पहले पार्टी राम मंदिर और विकास को लोकसभा चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाकर पेश कर रही थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 'मंदिर और गाय' पर चर्चा में लगा हुआ था.

अब यहां ये जानना दिलचस्प होगा कि 22 फ़रवरी हुई को अपनी आंतरिक बैठक में आरएसएस राम मंदिर जैसे मसलों को पीछे करके आतंकवाद के मुद्दे को आगे ले आया और ऐसे नेता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जो आतंकवाद से लड़ सके.

पुलवामा हमले के बाद विपक्ष मोदी को किसी तरह का फ़ायदा नहीं होने देना चाहता था लेकिन बालाकोट हमले के बाद उसे सरकार का समर्थन करने पर मजबूर होना पड़ा. हालांकि विपक्ष का ये समर्थन ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया क्योंकि अब बीजेपी और विपक्ष दोनों ही पुलवामा हमले को लेकर राजनीति कर रहे हैं.

कुछ विपक्षी पार्टियों ने एयर स्ट्राइक पर संदेह जताते हुए सरकार की आलोचना शुरू की तो कुछ ये सवाल पूछ रही हैं कि आत्मघाती हमलावर इतना विस्फोटक लेकर वहां पहुंचा कैसे? इन आरोपों के जवाब में मोदी और बीजेपी ने सवाल पूछने और शक़ जताने वालों को 'राष्ट्रविरोधी' का तमगा देना शुरू कर दिया है.

मोदी की सुरक्षा रणनीति से उलझा विपक्ष अब जवाबी रणनीति की योजना बना रहा है. कांग्रेस का दावा है कि उसके पास सरकार पर हमला करने के लिए बहुत से मुद्दे हैं और उनमें से ज़्यादातर मुद्दे ख़ुद बीजेपी ने पैदा किए हैं. इसके अलावा, पिछले दो दिनों में विपक्ष एयर स्ट्राइक के सबूत की मांग को लेकर एकजुट हुआ है.

विपक्ष के पास दूसरा विकल्प है- सरकार की विचारधारा और फ़ैसलों को चुनौती देने वाली आवाज़ों को देश भर से सामने लेकर आना.

विरोधी पार्टियों की तीसरी रणनीति ये हो सकती है कि वो रफ़ाल, नौकरियों, ग्रामीण और कृषि संकट जैसे मुद्दों को ज़ोरशोर से वापस लाएं.